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Wednesday, 21 November 2018

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 09.

आज भाग 09 में आप पढ़ेंगे...! मेरी जयपुर यात्रा का मुख्य उद्देश्य और यात्रा का दुःखद अंत.

बस ने एकदम से ब्रेक लगाया और मैं जैसे झटके से नींद में से उठा, तो देखा कि मैं रेलवे स्टेशन पहुंच चुका था। मैं बस से उतरकर अपनी होटल की तरफ बढ़ गया। कुछ ही देर पैदल चलने के बाद मैं होटल पहुंचा और फिर होटल से निकलने की तैयारी करने लगा। मैंने अपने कपड़े और बाकी अस्त-व्यस्त पड़े सामान को व्यवस्थित किया और अपना बैग जमाया और होटल के रिसेप्शन में फ़ोन कर जानकारी दी कि 'मैं अब होटल छोड़ना चाहता हूँ।' जानकारी देने के बाद मैं कमरे से रिसेप्शन के लिए निकल पड़ा। मेरा कमरा 4थें माले पर था, तो मैं लिफ्ट के सहारे नीचे आया और रिसेप्शन काउंटर पर जाकर कमरे की चाबी उन्हें सौंप दी। मैंने अपना बिल मांगा और हिसाब निपटाया। पर अभी तक मेरा सुबह का नाश्ता बाकी था, जो मेरी बुकिंग के साथ मुझे फ्री मिला था। मैंने उसकी मांग की, तो उन्होंने मुझे 2-3 ऑप्शन दिए। मैंने अपने लिए आलू का पराठा पसंद किया, जो उन्होंने कुछ ही देर में मेरे काउंटर पर भेज दिया। मैं अपने सुबह के नाश्ते में अपना पसंदीदा आलू का पराठा खाकर वहां की कुछ खट्टी-मीठी यादों के साथ अपने आगे के मिशन के लिए निकल पड़ा, जो कि मेरा मुख्य मिशन था।
मैं वहां से निकल कर कुछ दूरी तक पैदल ही चला और फिर मुख्य सड़क पर आ गया, जहा से मुझे आगे अपने मिशन को पूरा करने जाने में सुविधा हो।

मैंने वहां खड़े-खड़े अपने मोबाइल में उबर का एप्प डाउनलोड किया और एक उबर मोटरसाइकिल की बुकिंग की, जो कि करीब 10 मिनिट बाद ही मेरे सामने थी। यह उबर मोटरसाइकिल का मेरा पहला सफर था, तो मैं थोड़ा उत्साहित था। मैंने उबर मोटरसाइकिल के ड्राइवर का स्वागत किया और उसने भी मेरा अभिनंदन किया और मुझे एक भगवा हेलमेट पहनने को दिया। उबर ड्राइवर ने भी ऐसा ही एक काला हेलमेट पहन रखा था।
करीब आधा घंटा सफर के बाद मैं मेरे मुख्य उद्देश्य की पूर्ती हेतु निश्चित स्थान पर पहुंच गया। जहा मुझे कई भगवा भाइयों से मिलने का मौका मिला। जिसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी से भी गणमान्य उपस्थित थे, जिन्होंने मेरा बहुत सम्मान के साथ गले लगाकर स्वागत किया। उनसे गले लगना और इतना प्यार पाना वाकई बड़े गर्व की बात थी। बहुत ही खुशी के एहसास वाले उन पलों को भुलाना शायद मेरे बस की बात नहीं है। आज भी उन पलों को याद करता हूँ तो बस उन्ही सपनों में अपने आप को खोया हुआ पाता हूँ। उन पलों को याद करके आज भी दिल खुशी से नाच उठता है। मुझे जितना सम्मान और आदर मिला था, उतना तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। सभी भाइयों से मिलने के बाद और सबसे औपचारिक मुलाकात के बाद बैठक की तैयारियों में लग गया। मुझे आज पूरी बैठक का संचालन करना था, तो मैं उसी की तैयारी में लग गया और कुछ ही देर में मैंने बैठक की रूपरेखा तैयार कर अपनी तैयारी कर ली, ताकि मैं अपनी सबसे अच्छी प्रस्तुति दे सकु।

भगवा फ़ोर्स (एक राष्ट्रभक्त दल) की प्रदेश स्तरीय बैठक में मंच संचालन के लिए पूरे राजस्थान के सभी जिलों में से मुझे जिम्मेदारी दी गयी, जो मेरे लिए बड़े गर्व की बात भी थी और मुझे एक नया मौका भी मिल रहा था कि मैं अपनी क्रिएटिविटी को धार दे सकु। यह जिम्मेदारी मुझे निवर्तमान प्रदेश संगठन महामंत्री श्री पंकज जी शर्मा (वर्तमान में जयपुर संभाग अध्यक्ष) ने दी। मैं उनका आभारी हूँ कि उन्होंने मेरी योग्यता को पहचान कर उसमें मेरे लक्ष्य को भेदने में मेरे सारथी बने, जैसे महाभारत में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के बने थे। आज भी उनसे बात करके ऐसे महसूस होता है जैसे मैं अपने सग्गे बड़े भाई से ही बात कर रहा हूँ। उनका प्यार आज भी वैसा ही है जैसे पहली बार में था। आज भी उनके कॉल का इंतज़ार रहता है और उनसे बात करने को उत्सुकता रहती है।

सबसे पहले भगवान श्रीराम को दीपक करके उनका स्मरण किया और फिर मैंने शीर्ष नेतृत्व से भगवा फ़ोर्स की राष्ट्रीय बैठक की अनुमति ली और बैठक का आयोजन प्रारम्भ हुआ। मैंने सबका अभिवादन किया और अपना परिचय दिया। उसके बाद सब भगवा भाइयों ने अपना परिचय दिया। परिचय के दौर के बाद शीर्ष नेतृत्व से पधारे बड़े भाइयों ने अपने विचार रखें और विभिन्न जिलों से पधारे भाइयों ने भी अपने-अपने विचार रखें। उसके बाद विभिन्न पदाधिकारियों को उनके नियुक्ति पत्र प्रदान किये गए और फिर आपस में विभिन्न मुद्दों पर आपस में चर्चा हुई। सभी भगवा भाइयों ने इस चर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लिया। हिंदुत्व के मुद्दे पर सबकी एकजुटता देखकर बहुत अच्छा लगा। शीर्ष नेतृत्व को भी विभिन्न मुद्दो और समस्याओं से अवगत कराया गया। जिसमें उनका भी अच्छा सहयोग प्राप्त हुआ और इस तरह प्रदेश स्तरीय बैठक सम्पन्न हुई।

मैं भगवा फ़ोर्स की प्रदेश स्तरीय बैठक को सम्पन्न कर राष्ट्रीय कार्यकारिणी और सभी भगवा भाइयों से मिलकर वहां से अजमेर के लिए निकला। लेकिन वहां से कुछ विलंब के कारण मैं समय पर अजमेर नहीं पहुंच पाया। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश भी की, पर शायद मैं बहुत ज्यादा ही लेट था। मैंने जयपुर से प्राइवेट बस पकड़ी, पर वह भी मुझे समय पर अजमेर नहीं पहुंचा पाई। मुझे अजमेर से मुम्बई के लिए निकलना था और जयपुर से अजमेर का रास्ता करीब 3 घंटे का है। अब मेरे पास सिर्फ 02:30 घंटे बचे थे। मेरी सभी कोशिशें नाकाम होती नजर आ रही थी, फिर भी मैंने अंतिम समय तक हार मानना नहीं सीखा। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश में लग गया कि मैं समय पर अजमेर पहुंच जाऊ और वहां से ट्रैन पकड़ लु। पर शायद मेरी कोशिश आज नाकाम होने वाली थी। मैं मन ही मन भगवान से भी प्रार्थना कर रहा था, पर आज जैसे भगवान ने भी ठान ली कि इसे अपना सफर खुद ही तय करने दो। भगवान भी मेरी कौतूहलता और असमंजस की स्थिति को देखकर शायद मजे ले रहे थे और अंत में मुझे ऐसे लगा, जैसे भगवान ने मेरा हाथ बीच समुद्र में लाकर छोड़ दिया हो और कह रहे हो कि "जा...! अब आगे की कठिनाइयों से खुद ही लड़ और बाकी के समुद्र को तैरकर पार कर।" मैं आज समय के आगे हार गया। मैं रेलवे स्टेशन तो पहुंच गया, पर मेरी ट्रैन छूट चुकी थी और वह भी महज 10 मिनिट के लिए....! आज मुझे 10 मिनिट की कीमत का अंदाजा हो गया था।
यह बात मुझे बीच रास्ते में ही पता चल गई थी कि मेरी यह ट्रैन मुझे नहीं मिलेगी। इसलिए मैंने पहले ही समझदारी से काम लिया। कहते है ना कि बुरे समय में भी अपना आपा नहीं खोना चाहिए और समझदारी से काम लेना चाहिए और अगर आप सफर में हो तो स्टेपनी साथ में रखनी चाहिए। फिर भले ही वह सफर किसी गाड़ी का हो या जिंदगी का....!

एक मेरी हमेशा से ही आदत रही है कि मैं कही भी सफर में जाता हूँ तो वहां की सभी तैयारियां पहले से ही कर लेता हूँ और फिर यह तो पहला और अकेले सफर था। तो मैंने पहले ही Whare is my train नामक मोबाइल एप्प डाउनलोड कर रखा था, जिससे कि ट्रैन की लाइव लोकेशन का पता चल सके। जिसे मैंने बस में पूरे समय खोल रखा था। जिससे कि मुझे भविष्य की सटीक जानकारी बराबर हो रही थी और यही जानकारी मेरे काम को आसान बनाती गयी और इस संकट की घड़ी से मैं उबरने में सफल हो सका।

मैं जल्द ही अजमेर पहुंच गया, पर पहली ट्रैन निकल चुकी थी और अगली ट्रैन बस निकलने ही वाली थी। मैं जल्दी से टिकट कॉउंटर पर गया और इस ट्रैन का लोकल टिकट लिया और फटाफट ट्रैन की तरफ भागा। तब तक यह ट्रैन भी अपना सिग्नल दे चुकी थी, हॉर्न की आवाज सुनकर मेरी गति और बढ़ गयी, मैं भागकर ट्रैन जिस दिशा में जाने वाली थी, उसी तरफ भागा, ताकि ट्रैन छूट भी जाये तो मैं किसी भी डिब्बे में एक बार तो चढ़ जाऊ। मैं कुछ आरक्षित AC डिब्बो को छोड़कर आगे भागा, तो एक सामान्य डिब्बा दिखा। मैं समय न गंवाते हुए उसमें चढ़ गया और ऊपर की बर्थ पर जाकर सो गया। मैं जैसे ही ट्रैन में चढ़ा, ट्रैन प्लेटफॉर्म से अपने गंतव्य की ओर बढ़ गयी। अगर मैं कुछ सेकेंड चूक जाता तो यह ट्रैन भी छूट जाती और फिर वह रात मुझे अजमेर प्लेटफॉर्म पर ही गुजारनी पड़ती। जो कि मेरे लिए बहुत ज्यादा दुःखद होता।

मैंने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया और जैसे ही आंख बंद की, एक ऐसे खयाल ने मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी कि मैं अचानक से उठकर बैठ गया और पूरी ट्रैन में एक नजर दौड़ाने लगा।

यह ट्रैन अजमेर बांद्रा थी, जिसमें कि चित्तौड़गढ़ से उदयपुर वाली ट्रैन के डिब्बे जुड़ते है और अजमेर वाली इस ट्रैन के (जिसमें मैं था) कुछ डिब्बे अलग होते है, जो किसी और तरफ जाते है। अब मेरे साथ स्थिति यह थी कि मैं जिस सामान्य डिब्बे में चढ़ा, वह कहा के लिए है? मुझे नहीं पता था। मैंने इसकी जानकारी के लिए कुछ साथ वाले लोगों को पूछा तो उनका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला मुझे। सब कोशिश करने के बाद मेरे पास सिर्फ एक तरीका बचा था कि अगले स्टेशन पर उतर कर मैं जिस सामान्य डिब्बे में बैठा हुआ था, उस पर लगे ट्रैन के नाम के बोर्ड को पढ़कर पता लगाना और यह तरीका कामयाब भी हो गया। मैंने अगले स्टेशन पर उतकर कर यह काम कर लिया और निश्चिंत होकर अपने बर्थ पर सो गया और अपने "मेरी गुलाबी नगरी की पहली यात्रा का वृत्तांत" को लिखने में मशगूल हो गया..... और कब गुलाबी नगरी के सपनो में खो गया, पता ही नहीं चला.....????

समाप्त...!

Saturday, 17 November 2018

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 08.

आज भाग 08 में आप पढ़ेंगे...! मेरी जयपुर यात्रा की कुछ यादगार झलकियां.

मुख्य मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा सरोवर जैसा बना हुआ है, जिसके इर्द-गिर्द बहुत ही अच्छा बगीचा भी है और वही पर पक्षियों के लिए दाना-पानी की बहुत ही शानदार व्यवस्था भी है। मुख्य मंदिर के दर्शन के पश्चात मुख्य मंदिर से बाहर आकर पीछे सरोवर नुमा जगह और बगीचे को देखने का मन हुआ तो मैं उसी तरफ चल पड़ा। वहां जाने के लिए अलग से रास्ता बना हुआ है। मैं जब इस रास्ते से पीछे की तरफ गया तो वहां एक दरवाजा बना हुआ था, जिसके अंदर प्रवेश से पहले सुरक्षा यंत्र लगा था, जो सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण था। उस सुरक्षा यंत्र से गुजरने के बाद मैंने जब सरोवर नुमा बनी उस जगह में प्रवेश किया तो मेरे सामने बहुत ही शानदार नजारा था, उस सरोवर नुमा जगह में कई फव्वारे भी लगे थे, हांलाकि उसमें पानी नहीं भरा था, एकदम सूखा था। इसलिए फव्वारों का आनंद नहीं ले पाया, पर फिर भी बहुत ही शानदार नजारा था। मैं कुछ मिनिट वहां रूका और उस नजारे का आनंद लेने लगा। वहां शौचालय, स्नानघर आदि की भी बहुत ही शानदार व्यवस्था थी।
मैं ऐसे ही उस शानदार नजारे का आनंद लेने लगा कि तभी मेरी नजर वहां से दिख रहे एक छोटे से पहाड़ पर पड़ी। उस पहाड़ पर एक बहुत ही शानदार किला बना हुआ था, जो इतनी दूर से भी बहुत शानदार दिख रहा था। उस किले के बारे में जब मैंने वहां एक सुरक्षाकर्मी को पूछा तो उन्होंने मुझे उसका नाम "नाहर का किला" बताया। जिसका इतिहास भी बड़ा दिलचष्प है। वह किला दूर से तो एक ही दिखता है, पर वह 9 भागों में बना हुआ है, मतलब बाहर से तो वह एक ही है, पर अंदर से उसके 9 अलग-अलग भाग है। जो वहां के राजा नाहर सिंह जी ने अपनी 9 अलग-अलग रानियों के लिए बनवाएं थे। इसीलिए इसका नाम "नाहर का किला" पड़ा।
गोविंद देव जी का मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित श्रीकृष्ण जी की वास्तविक मूर्ति श्रीकृष्ण जी के प्रपौत्र वज्रनाभ ने लगभग 5000 साल पहले बनाई थी। जिसमें उनको अपनी दादी के कहे अनुसार लगभग तीन बार कोशिश करने के बाद सफलता मिली। इस मूर्ति निर्माण के समय वज्रनाभ की उम्र मात्र 13 साल थी।

गोविंद देव जी का मंदिर के पास एक तालकटोरा नामक स्थान है, जो कभी पानी से लबालब रहता था, पर अब यहां ऐसा नहीं होता। इसलिए कुछ समय पहले यहां एक विशाल सभा भवन बनाया गया, जिसमें कोई खंभा नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े खंभ-विहीन सभा भवन के रूप में इसे गिनीज बुक में स्थान दिया गया है। इस भवन की लंबाई 119 फीट है। जो अपने आप में एक आश्चर्य भी है।
मैं गोविंद देव जी का मंदिर के सुबह सुबह दर्शन कर अपने आप को बड़ा ही आनंदित महसूस कर रहा था और वहां से आनन्द के साथ विदा लेकर फिर वही गुलाबी नगरी के विभिन्न बाजारों में से होता हुआ अपनी होटल की तरफ जाने के लिए बस में बैठ गया और गुलाबी नगरी के सफर का आनंद लेते हुए कुछ रंगीन सपनो में खो गया और न जाने बस कब मेरे गंतव्य तक पहुंच गयी? पता ही नहीं चला।

क्रमशः...

(आगे... मेरी जयपुर यात्रा का मुख्य उद्देश्य और यात्रा का दुःखद अंत)
पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 09.

Wednesday, 14 November 2018

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 07.

आज भाग 07 में आप पढ़ेंगे...! गोविंद देव जी का मंदिर की भव्यता और इससे जुड़े इतिहास का वर्णन.

गोविंद देव जी का मंदिर के मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते ही बहुत सुखद और भक्तिमय वातावरण का सामना होता है। जहां हर तरफ भगवा झंडिया लगी हुई थी। मुख्य मंदिर की तरफ जाने के लिए विभिन्न पंक्तियां बनी हुई थी, जो कि एक विशाल मैदान जैसे भाग पर स्थित थी, उसी मैदाननुमा भाग पर कई धार्मिक वृक्ष भी लगे हुए थे, जिनकी श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर रहे थे और कई उनको नमन कर आगे बढ़ रहे थे। मैं भी पीपल के पेड़ को नमन कर आगे बढ़ गया।
थोड़ा आगे बढ़ते ही मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंच कर सीढ़ी पर नमन कर जैसे ही अंदर प्रवेश किया, एक बहुत बड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ में मैं अपने आप को ही खोजने लग गया। मतलब वहां इतनी भीड़ थी कि अगर साथ वाले किसी साथी या बच्चें का हाथ छूट जाए तो मिलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। उस भीड़ में श्रद्धालु अपने दोनों हाथ ऊपर कर कृष्ण भगवान का गान कर रहे थे, जो कि वहां के माहौल को एक भक्तिमय रंग से रंगीन कर रहा था। मैं भी उस भीड़ में घुस गया और गोविंद देव जी के दर्शनार्थ भीड़ से संघर्ष करने लग गया। मेरे एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में प्रसाद और चढ़ावा होने की वजह से थोड़ी परेशानी महसूस हुई, पर यह परेशानी ज्यादा देर नहीं टिक पाई। क्योंकि मुझे तो गोविंद देव जी के दर्शन करने थे और बिना संघर्ष या तपस्या के तो भगवान मिलते नहीं। अंततः मैं मंदिर में विराजित गोविंद देव जी और राधा जी की मूर्ति के बाहर लगी रेलिंग तक पहुंच गया और उनकी अलौकिक प्रतिमा के दर्शन कर अपने आप को बड़ा ही प्रफुल्लित महसूस करने लगा। वहां की सबसे अच्छी बात यह थी कि मोबाइल पर प्रतिबंध नहीं होने से हम फोटोशूट कर सकते है और वहां की यादों को संजो कर रख सकते है। जो कि मैंने बहुत अच्छे से किया। वैसे भी मुझे फोटोग्राफी का बहुत शौक है और वहां प्रतिबंध नहीं होना मेरे लिए दौहरी खुशी का कारण बन गया, जो कि मेरे लिए एक रोमांचक अहसास भी था।
मैं मुख्य मंदिर में विराजित गोविंद देव जी के दर्शनार्थ वहां लगी पंक्ति में जुड़ गया और इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में मेरा इंतज़ार पूर्ण हुआ और मैं मुख्य मंदिर में विराजित गोविंद देव जी और राधा जी की मनोहारी छटा बिखेरती और असली प्रतीत होती मूर्ति के सामने पहुंच गया और नमन कर प्रसाद पास ही रखी एक टोकरी में रखा। वहां पर प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता। यह जानकारी मुझे अंदर जाने के बाद वहां की व्यवस्था संभाल रहे एक सुरक्षा कर्मी द्वारा पता चली। कोई भक्त जानकारी के अभाव में प्रसाद ले आता है तो वहां एक टोकरी रखी है, उसमें वह प्रसाद रख दिया जाता है। उस टोकरी के पास एक पंडित जी बैठे रहते है। मैंने भी वह प्रसाद उस टोकरी में रखकर प्रणाम कर आगे बढ़ गया। पर उन पंडित जी ने आवाज देकर मुझे बुलाया और अत्तर तो उन्होंने वही रख लिया और मिश्री की थैली में कुछ तुलसी पत्र डालकर मुझे वह थैली दे दी। इसके बाद मैं मंदिर की परिक्रमा करने लगा तो मंदिर के पीछे जाने पर वहां का नजारा देखकर मन खुश हो गया। बहुत ही सुंदर नजारा था वह।
क्रमशः...

(आगे... मेरी जयपुर यात्रा की कुछ यादगार झलकियां)
पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 08.

Wednesday, 19 September 2018

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 06.

आज भाग 06 में आप पढ़ेंगे...! मुख्य सड़क से गोविंद देव जी का मंदिर तक का यादगार सफर.

हवा महल से थोड़ा आगे जाने पर प्रसिद्ध गोविंद देव जी का मंदिर में प्रवेश करने के लिए दो दरवाजे है। जिसमें से मैंने दूसरे दरवाजे को चुना, इन दरवाजों से गुजरने के बाद हम मंदिर की तरफ बढ़ सकते है। मुख्य सड़क पर बने दूसरे दरवाजे में प्रवेश के बाद करीब 500 मीटर चलने के बाद गोविंद देव जी का मंदिर का एक ओर दरवाजा आता है। इस 500 मीटर की सड़क पर दोनों तरफ अच्छा मार्किट है। जहां विभिन्न प्रकार की दुकानें भी नजर आने लगी, जिनमें चाय-नाश्ते से लेकर प्रसाद आदि विभिन्न प्रकार की चीजें बिक रही थी। वैसे मैं सुबह काफी जल्दी गया था, जब तक मार्किट पूरी तरह से खुले ही नहीं थे और दूसरा रविवार होने की वजह से ज्यादातर मार्किट बन्द ही रहते है। तो मैं पूरे खुले मार्किट को नहीं देख पाया। यह एक इच्छा अधूरी रह गयी। जो अगली बार की जयपुर यात्रा के समय पूरी करूँगा। इसी मार्किट में एक बहुत ही बड़ा गुरुद्वारा भी है, जिसमें सिक्ख धर्म के लोगों के अलावा भी अन्य धर्म के लोग जा रहे थे। इस गुरुद्वारे में एक विद्यालय भी चल रहा है, जो शायद सिक्ख धर्म का ही होगा, जो श्री गुरुनानक देव माध्यमिक विद्यालय (सेवा संघ) के नाम से जाना जाता है। यह एक धार्मिक  मुझे भी अंदर से गुरुद्वारा देखने की इच्छा हुई, पर समय की मर्यादा को ध्यान में रखकर बाहर से ही नमन कर आगे बढ़ गया।

थोड़ा आगे चलने पर एक ओर दरवाजा आता है। इस दरवाजे से अंदर प्रवेश करने पर दोनों तरफ फूल-माला, प्रसाद, भगवान के वस्त्र, अगरबत्ती, मिठाई आदि की दुकानें थी, जहां लोगो का जमावड़ा लगा हुआ था। चूंकि मैं पहली बार यहां आया तो मुझे पता नहीं था कि यहां मंदिर में क्या चढ़ाया जाता है? तो इसकी जानकारी के लिए मैंने वही एक दुकानदार को पूछा, तो उसने मुझे बताया कि यहां अत्तर, अगरबत्ती और प्रसाद चढ़ा सकते है। तो मैंने अत्तर, अगरबत्ती और प्रसाद के रूप में मिश्री ले ली, क्योंकि मुझे पता है कि कृष्ण भगवान को मिश्री का भोग लगाया जाता है। इस तरह मैंने अत्तर, अगरबत्ती और मिश्री के साथ श्री गोविंद देव जी का मंदिर के मुख्य दरवाजे में प्रवेश किया। जिसमें से होकर गुजरने के बाद सब तरफ लोग ही लोग नजर आने लगे। गोविंद देव जी का मंदिर में प्रवेश के साथ ही एक अलग ही शांति का अनुभव होता है। श्री गोविंद देव जी का मंदिर के मुख्य दरवाजे के बाहर से ही सब तरफ जय श्री कृष्णा और राधे-राधे की आवाजें आने लगी। वहां श्री कृष्णा के भजन भी लगातार चल रहे थे, जिससे कि एक भक्तिमय माहौल अनायास ही बन रहा था और अपने अंदर एक धनात्मक (Positive) ऊर्जा का एहसास हो रहा था।

कृमशः...

(आगे... गोविंद देव जी का मंदिर की भव्यता और इससे जुड़े इतिहास का वर्णन)
पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 07.

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 05.

आज भाग 05 में आप पढ़ेंगे...! ऐतिहासिक धरोहरों के साथ आधुनिक तकनीक का शानदार संगम.

जयपुर अपनी रंगत बिखेरता हुआ नजर आ रहा है और उस रंगत के साथ कुछ आधुनिक तकनीकी भी जुड़ रही है। जयपुर मेट्रो का कार्य निरंतर चल रहा है, हालाकि जयपुर में मेट्रो बहुत पहले से ही अपनी सेवाएं दे रही है और अब इसकी सेवाओ को ओर बढ़ाया जा रहा है। जो कि इस ऐतिहासिक नगरी के सिर पर ताज का काम करेगी। इस ऐतिहासिक नगरी की उपयोगिता सुप्रसिद्ध है, क्योंकि यह राजस्थान की राजधानी भी है, जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। जयपुर को गुलाबी नगरी भी कहा जाता है, जो कि इसे देखने के बाद चरितार्थ हो जाता है। क्योंकि यहां की ज्यादातर इमारतें गुलाबी रंग से रंगी गयी है। यहां के स्कूल, पुलिस चौकी और विभिन्न सरकारी संस्थान भी ज्यादातर गुलाबी ही नजर आएंगे।

विभिन्न मार्किट से आगे निकलने पर एक बहुत ही विशाल इमारत पर मेरी नज़र पड़ी, जो कि काफी ऊंची और बहुत से गौखरों से भरी इमारत थी। यह इमारत विश्व प्रसिद्ध और अपने आप में इतिहास को समेटे हुए हवा महल नामक महल था, जो राजा-महाराजाओं के जमाने में बना था। हवा महल को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य था कि जब राजा-महाराजा युद्ध जीतकर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए पूरे राज्य में सवारी निकालते थे, तो उस सवारी को रानियां भी देख सके। राजस्थान में घूंघट प्रथा होने से रानियों का सवारी देखना संभव नहीं था, तो किसी राजा ने हवा महल का निर्माण करवाया, जिससे रानियां तो सवारी देख सके पर बाहर का कोई व्यक्ति रानियों को नहीं देख सके।

कृमशः...

(आगे... मुख्य सड़क से गोविंद देव जी का मंदिर तक का यादगार सफर) पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 06.

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 04.

आज भाग 04 में आप पढ़ेंगे...! गुलाबी नगरी के बहुत ही रोमांचित कर देने वाले क्षण.

रेलवे स्टेशन के बाहर से बस द्वारा गोविंद देव जी का मंदिर
जा रहा था, तो रास्ते में "चाँद पोल" नाम का एक बड़ा सा गेट (दरवाजा) आया, जो शायद बहुत पुराना होगा (राजा महाराजाओं के जमाने का)। इसके बारे में जब मैंने बस ड्राइवर को पूछा तो उन्होंने बताया कि यह तो जब से जयपुर बना, तभी से ही है। मतलब यह एक ऐतिहासिक दरवाजा है, जो काफी पुराना है। इसे सड़क के बीचों-बीच इस तरह बनाया गया है कि सड़क पर चलने वाले साधनों को इसके नीचे से गुजरना पड़ता है। इस दरवाजे में दो बड़े-बड़े लकड़ी के दरवाजे (किवाड़) भी लगे है, जिन्हें यदि बंद कर दिया जाए तो यातायात रुक जाएगा।

चाँद पोल गेट से थोड़ा आगे चलने के बाद एक बहुत पुराना मार्किट है, जिसको देखने से ही यह पता चल जाता है कि यह बहुत पुराना होगा। इस मार्किट के बारे में एक सहयात्री से बात करने पर पता चला कि यह काफी पुराना मार्किट है, जिसका रंगाई-पुताई का कार्य अभी कुछ ही समय पहले हुआ है, जिस कारण यह थोड़ा चमक रहा है। इस मार्किट का नाम पूछने पर उसने "छोटी चौपड़" बताया। छोटी चौपड़ नामक मार्किट के आगे भी इसी तरह के कई मार्किट है, जिनके नाम गंगोरी बाजार, बड़ी चौपड़ आदि आदि है। एक जैसी आकृति में और एक ही रंग के यह मार्किट मुझे काफी पसंद आये। जिनमें आगे विभिन्न दुकानों के नाम भी एक सरीखे लिखे हुए थे। एक सफेद बॉक्स में काले रंग से एक ही फॉन्ट और साइज में लिखे नाम ऐसे लग रहे थे, जैसे सब एक ही कारीगर की कारीगरी हो। एक ही धागे में एक सरीखे मोतियों की तरह वे इतिहास के साथ-साथ एकता का भी संदेश दे रहे थे।

कृमशः...

(आगे... ऐतिहासिक धरोहरों के साथ आधुनिक तकनीक का शानदार संगम) पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 05.

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 03.

आज भाग 03 में आप पढ़ेंगे...! मेरे कई रोमांचक और पहले अनुभवों का पिटारा.

थोड़ा चलने के बाद मैंने एक साईकल रिक्शा वाले काका (जिनको देखकर ही उनकी उम्र का पता लगाया जा सकता है, उनकी उम्र 45 से 50 साल के करीब होगी।) को देखा तो मुझे साईकल रिक्शा में बैठने की इच्छा हो गयी। क्योंकि ऐसे रिक्शा उदयपुर में तो चलते ही नहीं और मैं भी कभी ऐसे रिक्शा में बैठा नहीं। आज पहली बार साईकल रिक्शा में बैठने का अनुभव लेना ही उचित समझा और उन काका से गोविंद देव जी मंदिर चलने को कहा। पर उन्होंने बताया कि गोविंद देव जी का मंदिर यहां से बहुत दूर है, जहां तक साईकल रिक्शा चलाना संभव नहीं है। पर उन्होंने बताया कि मैं आपको रेलवे स्टेशन के बाहर बस स्टेशन तक छोड़ दूंगा, जिसका किराया मात्र ₹30 होगा और वहां से गोविंद देव जी का मंदिर जाने की बस में भी बिठा दूंगा। तो यह बात मुझे भी पसंद आई।

मुझे भी पहली बार साईकल रिक्शा का अनुभव करना था, इसलिए मैं ज्यादा बहस न करके साईकल रिक्शा में बैठ गया और उन काका ने मुझे रेलवे स्टेशन के बाहर ही स्थित बस स्टेशन तक मात्र 5 से 7 मिनिट में ही छोड़ दिया और गोविंद देव जी का मंदिर के लिए सही बस में भी बिठा दिया। इस तरह जयपुर में पहले दिन की शुरुआत हुई, जो काफी कम समय की लेकिन बहुत ही अच्छी शुरुआत थी और ऊपर से पहली बार साईकल रिक्शा में बैठने का अनुभव बहुत ही रोमांचित करने वाला था, जो हमेशा याद रहेगा। आपको बता दु कि मैं जयपुर भी पहली ही बार आया हूँ और पहले सफर के पहले दिन की शुरुआत और पहली बार साईकल रिक्शा में बैठने का अनुभव..... सब कुछ पहली ही बार हुआ। मजा आ गया...!

कृमशः...

(आगे... गुलाबी नगरी के बहुत ही रोमांचित कर देने वाले क्षण) पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 04.

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 02.

आज भाग 02 में आप पढ़ेंगे...!
रात रुकने के बाद नई सुबह का सफर.

रात को एक गिलास दूध के साथ कुछ यादों को गोलकर पीने की इच्छा हुई। शाम का खाना नहीं खा पाया था, क्योंकि एक तो मैं ट्रैन में था और दूसरा शनिवार होने की वजह से मेरा व्रत भी था। रात को थोड़ी भूख महसूस हुई तो मैंने दूध पीना ज्यादा उचित समझा, क्योंकि रात के समय में अगर पीने के लिए कोई पोष्टिक चीज है तो वह है दूध और दूध पीने का सही समय भी रात का ही होता है। इसलिए मैंने एक गिलास दुख मंगाया और पीकर सो गया। मुझे सुबह समय से उठकर आगे के कार्य भी पूरे करने थे। इसलिए ज्यादा समय न खराब करते हुए जल्द ही सो गया और इस तरह मेरा पहला दिन अस्त हो गया और अब दूसरे दिन का इंतज़ार था, जो कि मेरे लिए कई यादगार लम्हों को लेकर आने वाला था।

रोज की तरह सुबह 05:45 बजे के अलार्म के साथ आंख खुली, पर थोड़ा आलस तो सुबह के समय हावी हो ही जाता है, तो मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। अलार्म बन्द करके फिर से सो गया तो 06:30 के बाद ही आंख खुली। सुबह-सुबह थोड़ी ठंड तो महसूस हो रही थी, पर आगे की कुछ यादों के रोमांचक अनुभव के आगे उसने भी घुटने टेक दिए। बस, फिर तो नयी सुबह, नया जोश वाली बात हो गयी और इसी जोश ने नित्य कर्मो से निवृत करवा दिया और नहाकर तैयार हो गया और घड़ी में देखा तो 07:00 से ऊपर बज चुके थे। अब मैं होटल से बाहर आया और मोबाइल में गूगल मैप को खोलकर सबसे पहले जयपुर के प्रसिद्ध और भव्य मंदिर श्री गोविंद देव जी का मंदिर की लोकेशन देखी और उसी अनुसार निश्चित दिशा की और अपने कदम बड़ा लिए।

कृमशः...

(आगे... मेरे कई रोमांचक और पहले अनुभवों का पिटारा) पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 03.

गुलाबी नगरी की मेरी पहली यात्रा की कुछ स्मृतियाँ भाग 01.

आज भाग 01 में आप पढ़ेंगे...!
मेरी यात्रा की शुरुआत और जयपुर तक पहुंचने का सफर.

मैंने पहली बार जयपुर की यात्रा की। यह यात्रा काफी यादों से भरी और रोमांचक थी। मैंने पहले ही उदयपुर से जयपुर के लिए रेल में टिकट ले लिया, जिससे कि सफर में कोई असुविधा न हो। मैंने उदयपुर से दोपहर 03:05 की रेल पकड़ी और रात 10:10 पर जयपुर पहुंच गया। चूंकि रात का समय था और रुकने का कोई ठिकाना भी निश्चित नहीं था और यह जयपुर की पहली यात्रा भी थी। जयपुर के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी, तो मैंने रेल में ही ओयो (OYO) के माध्यम से एक कमरा किराए पर ले लिया, जो कि अंकुर पैलेस होटल में था। मैंने जयपुर पहुंचने के बाद रेलवे स्टेशन से बाहर आकर गूगल मैप के माध्यम से होटल की लोकेशन चालू करके पैदल ही होटल चलना ज्यादा उचित समझा, क्योंकि मेरे पास अब बहुत समय था। मुझे होटल में कमरा रात 12:00 बजे से सुबह 11:00 बजे तक के लिए मिला था। रेलवे स्टेशन से होटल जाने में मुझे मुश्किल से आधा घंटा ही लगा होगा। मैंने होटल पहुंच कर कमरे के लिए होटल के रिसेप्शन पर बात की, तो उन्होंने मुझसे आईडी मांगकर रजिस्टर में मेरी जानकारी लिखी और मुझे कमरा नं. 403 दिया। मेरे साथ होटल का एक स्टाफ आया और मुझे कमरे में छोड़कर चला गया। इस कमरा नं. के साथ मेरी कुछ फीलिंग्स भी जुड़ गई, क्योंकि कमरा नं का सांख्यिकी योग (4+0+3) किया जाए तो योग 07 आएगा, जो कि मेरा लकी नं. भी है और मेरा पसंदीदा नं. भी। पहली ही यात्रा में पसंदीदा नं. का कमरा मिलने से मेरी खुशी काफी बढ़ गई, पर होटल ज्यादा अच्छी नहीं थी, न ही वहां की सुविधाओं में कुछ खास दिखा मुझे। वहां का स्टैंडर्ड भी इतना खास नहीं था। बस वहां की कोई चीज मुझे पसंद आई तो सिर्फ कमरा नं. और वहां के स्टाफ का व्यवहार। स्टाफ का व्यवहार ज्यादा अच्छा नहीं तो ज्यादा बुरा भी नहीं था।

कृमशः...

(आगे... रात रुकने के बाद नई सुबह का सफर) पढ़ते रहिए, गुलाबी नगरी की......... भाग 02.