वैसे तो पुरुष एक ऐसा मजबूत स्तम्भ है, जिस पर समाज और परिवार रूपी छत मजबूती से टिकी होती है। पर आश्चर्य इस बात का है कि, आज सामाजिक व्यवस्थायें और कानूनी सीमा-रेखाएं इतनी भेदभावपूर्ण हो चुकी है कि, यह मजबूत स्तम्भ दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है।
इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि, आज पुरुष सुरक्षित नहीं है, तो निकट भविष्य में मानवता विलुप्तप्राय श्रेणी में आ जाएं, तो ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चहिये।
आज स्त्रियों की मर्यादा भंग का मुद्दा जितना खतरनाक है, उससे भी कई गुना ज्यादा खतरनाक है, पुरुष प्रताड़ना का मुद्दा। (आज सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना है कि, दहेज़ और बलात्कार के 100 में से 80 मामले या तो पैसे के लिए होते है या बदले की भावना से या आपसी दुश्मनी निकालने के लिए। मतलब यह झूठे मामले होते है।)
मर्यादाएं पुरुष के लिए है, तो मर्यादाएं स्त्री के लिए भी है। लेकिन दोनों की अपनी मर्यादाएं है। जिनकी तुलना करना बेईमानी होगी। क्योंकि दो विपरीत स्थितियों की तुलना कभी हो ही नहीं सकती।
आजकल एक नया ट्रेंड ओर चल रहा है कि, पुरुष यह कर सकता है, तो स्त्रियां क्यों नहीं कर सकती? पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को सिर्फ चूल्हे-चौके तक ही सिमित रखना अत्याचार है... आदि-आदि...! (यहा हमें यह समझना अतिआवश्यक हो जाता है कि, पुरुष और स्त्री, दोनों ही प्रकृति के दो अनमोल उपहार है और प्रकृति ने इन्हें अलग-अलग ही बनाया है।)
हा, यह हम भी मानते है कि, स्त्रियां भी पुरुषों के बराबर की हक़दार है। उन्हें भी स्वतंत्रता प्यारी है। उन्हें भी अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है। उन्हें भी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का अधिकार है। उन्हें भी आधुकिकता के साथ आधुनिक जीवन जिने का अधिकार है। यह सही भी है, इसमें कोई गलत बात नहीं।
पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को भी समान अधिकार दिये गये है। आप विचार करिये... अगर ऐसा नहीं होता, तो क्या कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में जा पाती? तो क्या इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन पाती? तो क्या किरण बेदी आईपीएस अधिकारी बन पाती? तो क्या निर्मला सीतारमण वित्त मंत्रालय संभाल पाती? तो क्या स्त्री कानून बन पाते?
नहीं न... तो समाज को पुरुष प्रधान कह कर समाज और पुरुषों के जीवन के साथ घिनोना खेल खेलना बंद होना चाहिए। क्योंकि आज का समाज सही मायनों में पुरुष प्रधान रहा ही नहीं। आज का समाज धीरे-धीरे महिला प्रधान बनते जा रहा है।
हर परिस्थिति या बदलाव के अपने फायदे होते है, तो उसके साथ नुकसान भी उतना ही होता है। कुछ नये बदलावों का निकट भविष्य में तो बहुत फायदा दिखता है, पर लम्बे समय में उसका नुकसान भी उतना ही बड़ा होता है। समय के साथ बदलाव आवश्यक है, पर धर्म और मर्यादा को एक तरफ रखकर किया गया बदलाव हमेशा घातक ही होता है। यह आज हमें समझने की बहुत जरूरत है।
बहुत कम शब्दों में कहे, तो...
पुरुष की अपनी मर्यादाएं सुनिश्चित है और स्त्रियों की अपनी। जिसका दोनों को ही कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। साथ ही दोनों को एक-दूसरे के साथ तुलना नहीं करना ही समाज और मानवता के हित में है। क्योंकि मानवता की कल्पना दोनों में से एक के भी न होने पर की ही नहीं जा सकती।
इस सुंदर संसार की कल्पना न ही पुरुष के बिना सम्भव है और न ही स्त्री के बिना।
(आप मेरे विचारों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन हकीकत से मुँह फेर लेना भविष्य के लिए कभी सही नहीं होगा।)