Tuesday, 25 March 2025

पुरुष: स्त्री की सोच में...!

वैसे तो पुरुष एक ऐसा मजबूत स्तम्भ है, जिस पर समाज और परिवार रूपी छत मजबूती से टिकी होती है। पर आश्चर्य इस बात का है कि, आज सामाजिक व्यवस्थायें और कानूनी सीमा-रेखाएं इतनी भेदभावपूर्ण हो चुकी है कि, यह मजबूत स्तम्भ दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है।

इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि, आज पुरुष सुरक्षित नहीं है, तो निकट भविष्य में मानवता विलुप्तप्राय श्रेणी में आ जाएं, तो ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चहिये।

आज स्त्रियों की मर्यादा भंग का मुद्दा जितना खतरनाक है, उससे भी कई गुना ज्यादा खतरनाक है, पुरुष प्रताड़ना का मुद्दा। (आज सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना है कि, दहेज़ और बलात्कार के 100 में से 80 मामले या तो पैसे के लिए होते है या बदले की भावना से या आपसी दुश्मनी निकालने के लिए। मतलब यह झूठे मामले होते है।)

मर्यादाएं पुरुष के लिए है, तो मर्यादाएं स्त्री के लिए भी है। लेकिन दोनों की अपनी मर्यादाएं है। जिनकी तुलना करना बेईमानी होगी। क्योंकि दो विपरीत स्थितियों की तुलना कभी हो ही नहीं सकती।

आजकल एक नया ट्रेंड ओर चल रहा है कि, पुरुष यह कर सकता है, तो स्त्रियां क्यों नहीं कर सकती? पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को सिर्फ चूल्हे-चौके तक ही सिमित रखना अत्याचार है... आदि-आदि...! (यहा हमें यह समझना अतिआवश्यक हो जाता है कि, पुरुष और स्त्री, दोनों ही प्रकृति के दो अनमोल उपहार है और प्रकृति ने इन्हें अलग-अलग ही बनाया है।)

हा, यह हम भी मानते है कि, स्त्रियां भी पुरुषों के बराबर की हक़दार है। उन्हें भी स्वतंत्रता प्यारी है। उन्हें भी अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है। उन्हें भी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का अधिकार है। उन्हें भी आधुकिकता के साथ आधुनिक जीवन जिने का अधिकार है। यह सही भी है, इसमें कोई गलत बात नहीं।

पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को भी समान अधिकार दिये गये है। आप विचार करिये... अगर ऐसा नहीं होता, तो क्या कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में जा पाती? तो क्या इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन पाती? तो क्या किरण बेदी आईपीएस अधिकारी बन पाती? तो क्या निर्मला सीतारमण वित्त मंत्रालय संभाल पाती? तो क्या स्त्री कानून बन पाते?

नहीं न... तो समाज को पुरुष प्रधान कह कर समाज और पुरुषों के जीवन के साथ घिनोना खेल खेलना बंद होना चाहिए। क्योंकि आज का समाज सही मायनों में पुरुष प्रधान रहा ही नहीं। आज का समाज धीरे-धीरे महिला प्रधान बनते जा रहा है।

हर परिस्थिति या बदलाव के अपने फायदे होते है, तो उसके साथ नुकसान भी उतना ही होता है। कुछ नये बदलावों का निकट भविष्य में तो बहुत फायदा दिखता है, पर लम्बे समय में उसका नुकसान भी उतना ही बड़ा होता है। समय के साथ बदलाव आवश्यक है, पर धर्म और मर्यादा को एक तरफ रखकर किया गया बदलाव हमेशा घातक ही होता है। यह आज हमें समझने की बहुत जरूरत है।

बहुत कम शब्दों में कहे, तो...
पुरुष की अपनी मर्यादाएं सुनिश्चित है और स्त्रियों की अपनी। जिसका दोनों को ही कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। साथ ही दोनों को एक-दूसरे के साथ तुलना नहीं करना ही समाज और मानवता के हित में है। क्योंकि मानवता की कल्पना दोनों में से एक के भी न होने पर की ही नहीं जा सकती।

इस सुंदर संसार की कल्पना न ही पुरुष के बिना सम्भव है और न ही स्त्री के बिना।

(आप मेरे विचारों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन हकीकत से मुँह फेर लेना भविष्य के लिए कभी सही नहीं होगा।)

Friday, 21 March 2025

स्त्री: पुरुष की सोच में...!

जब भी महिला स्वतंत्रता या सशक्तिकरण पर बात होती है, तो एक विशेष पुरुष वर्ग महिलाओ के छोटे कपड़ो से लेकर उनकी मर्यादा तक, सभी ज्ञान एक साथ उडेलने लग जाता है। जैसे वे सब बाल ब्रम्हचारी, ऋषि-मुनी हो।

अरे मूर्खों...! अपनी नपुसंकतावादी सोच को थोड़ा तो कभी विराम भी दे दिया करो।

चलो, मान लिया कि, आज की आधुनिक महिला हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, पर अपनी मर्यादा भूल चुकी है। वह आधे कपड़े पहनती है। रात को देर तक घर की चार-दीवारी से बाहर रहती है। वह सबसे हंसकर बात कर रही है। तो क्या बलात्कार के पीछे बस यही वजह सर्वमान्य है? क्या एक स्त्री अपनी इज्जत लुटवाने स्वयं तुम्हारे पास आती है? क्या तुम अपनी मर्यादा में हो? क्या पर-स्त्री पर भूखे भैड़ियों की तरह टूट पड़ना तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में आता है?

तुम्हें पसंद यह नहीं आ रहा कि, एक स्त्री को पुरुष की पैर की जूती बनने से ज्यादा गँवारा चांद पर कदम रखना लग रहा है। उसे घर की चार-दिवारी से अच्छा दुनिया में स्वतंत्र घूमना लग रहा है और सबसे बड़ी बात... तुम इनका विरोध नहीं कर पा रहे, तो इनकी आधुनिक सोच का विरोध कर रहे हो। तुम इनकी बराबरी नहीं कर पा रहे, तो इन पर अपनी कुदृष्टि डाल डराने की असंभव कोशिश कर रहे हो।

अरे नपुसंकों...! मर्दानगी एक स्त्री की रक्षा करने में है, न कि उसकी इज्जत लूटने में। स्त्री हमेशा से पवित्र और पूजनीय थी, है और जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक रहेगी।

मेरी नजर में...
मर्द या पुरुष वही है, जिसको देखकर एक स्त्री अंधेरी रात में भी अपने आपको सबसे सुरक्षित और खुश महसूस करें। बाकी तो नामर्दों की भोज हर जगह भरी पड़ी है।

एक स्त्री की ऊँची उड़ान में उसके पंख न बन सको, तो चलेगा। लेकिन मांझा (पतंग का धागा) बन उसका गला मत काटों। यही पुरुष का स्वाभाविक गुण है, पौरुषत्व है।

(आप मेरे विचारों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन हकीकत से मुँह फेर लेना भविष्य के लिए कभी सही नहीं होगा।)

Saturday, 7 December 2024

दान के प्रारूप...

हर उस आडम्बरी भामाशाह को; जो दान-पुण्य के नाम पर फोटो लेकर और मंचासीन होकर मान-सम्मान लेकर अपने आपको बड़ा भामाशाह समझ रहा है। उसे एक बार श्री मद्भगवद्गीता जी के अध्याय 17 के श्लोक 20-21-22 पढ़ने ही चाहिए। इसमें दान के रूपों का वर्णन किया गया है...

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेSनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्।।20।।
जो दान कर्तव्य समझकर, किसी प्रत्युपकार की आशा के बिना, समुचित काल तथा स्थान में और योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्त्विक माना जाता है।
🚩🚩🌹🌹🙏🙏

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।21।।
किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छा पूर्वक किया जाता है, वह रजो गुणी (राजस) कहलाता है।
🚩🚩🌹🌹🙏🙏

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्र्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।22।।
जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह तामसी कहलाता है।
🚩🚩🌹🌹🙏🙏

अब आप खुद से ही विचार करें कि, हम जो दान के नाम पर ढकोसला बाजी कर रहे है। क्या वह तामसी दान की श्रेणी में भी आता है या उससे भी नीचे...?

हम जो पुण्य के नाम पर या उसकी आड़ लेकर पाप कर रहे है, उसका परिणाम बहुत बुरा है। यह धर्म नहीं, अधर्म है और अधर्म का परिणाम तो आपको पता ही है...!🙏

जय श्री कृष्ण...🙏🚩

Tuesday, 25 June 2024

आपातकाल पर संसद में मोदी जी के भाषण पर एक आम आदमी की प्रतिक्रिया...!

मोदी जी...

आपको संसद में 1975 के आपातकाल की जानकारी देने या भाषण देने देश की जनता ने नहीं चुना है। आपकी भाषाशैली और Body Language आम जनता पिछले 10 सालों से सुन और देख रही है। आपके प्रयासों से राम मंदिर बन गया, धारा 370 हट गयी, बड़े-बड़े ब्रिज बन गये। जिसका परिणाम यह है कि, आज आप संसद में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर भाषणबाजी कर रहे है।

आप केंद्र में सबसे ऊँचे पायदान पर बैठे है। आप किसी पार्टी के प्रवक्ता नहीं है और न ही कोई पत्रकार। इसलिए जनता ने जिस उम्मीद के साथ आपको केंद्र में बिठाया है, उन उम्मीदों को पुरा करने पर अपना ध्यान केंद्रित कीजिये, न कि आपातकाल की यादों पर।

मुंबई में अभी बने नये ब्रिज पर पहली ही बारिश में क्रैक्स आ गये है। राम मंदिर के गर्भ गृह में पहली ही बारिश में पानी भर गया है। आपके शपथ गृहण समारोह के दिन हुए आतंकी हमले को आज 16 दिन पूर्ण हो चुके है। विपक्ष आपको कानून की पुस्तके दिखाकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है और सबसे बड़ी बात... आपका यह अंतिम कार्यकाल भी है, जो शायद पूरे 5 वर्षों का भी न हो। आप कभी भी उच्च पायदान से नीचे, सबसे नीचे वाले पायदान पर स्विप कर सकते है।

विकास-विकास...! देश को विकास से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है। जनता को खुशहाल जीवन की जरूरत है।

जब एक पिता अपने भूखे बीवी-बच्चों को देखता है न, तो वह समय उसके लिए सबसे बुरा समय होता है। तब उसे अपने पुरुषत्व पर शर्म आने लगती है। जब एक बेटा अपने भूखे मां-बाप को देखता है न, वह समय उसके लिए सबसे बुरा होता है। अपने बेटा होने पर उसे शर्म आती है। जब एक जवान पुरुष के होते हुए उसकी बीवी को एक कटोरी सब्जी लेने पड़ोस में जाना पड़ता है न, तब पुरुषत्व को कलंकित होना पड़ता है। तब मानवता शर्मसार होती है।

अरे मोदी जी...! बहुत हो गया विकास, बहुत हो गयी Black Money पर बड़ी-बड़ी बातें। अब आम जनता की जीवनशैली का विकास करिये। अब भारत को सोने की चिड़ियाँ भले ही मत बनाइये, पर चिड़ियाँ दाना चुग सके। बस, इस लायक रहने दीजिये।

हमें गाँव ही प्यारे है। हमें जबरदस्ती शहर घुमाने मत ले जाइये। हमें Smart City नहीं, Unsmart Village चाहिए।🙏

Sunday, 23 June 2024

एक पहल, बहन-बेटियों को मानसिक सम्बल...!🙏

मैंने ट्रेन के दरवाजे के पीछे लिखे नंबर पर कॉल लगाया, "आप रेनू जी बोल रही है?"

(डरी और सहमी-सी आवाज में रिप्लाई आया) "जी हां, लेकिन आप कौन और आपको मेरा यह नंबर कहा से मिला?"

"दरअसल वो ट्रेन... दरअसल वो ट्रेन के डिब्बे में किसी ने आपका नंबर आपके नाम से लिख रखा है। शायद आपका कोई अच्छा दुश्मन या फिर कोई बुरा दोस्त होगा! जो भी हो, मुझे आपसे यह कहना था कि, हो सके तो ये नंबर बदल लीजियेगा या फिर किसी अच्छे से जवाब के साथ तैयार रहिएगा। वैसे अब तक जितने कॉल्स आ गए, आ गए... आज के बाद किसी का नहीं आएगा। क्योंकि यह नंबर मैं डिलीट कर चुका हूं।"

"रेनू जी...! अब मैं फ़ोन रखता हूं। अपना ख्याल रखियेगा।"

तब उसने मुझे बोला कि, "नए-नए अनजाने नंबर और उन पर गंदी और भद्दी बातों की वजह से मैं बहुत परेशान थी। आप जो भी हो, आपने मेरी बहुत बड़ी मदद की है। क्योंकि मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि, ऐसे कॉल क्यों आ रहे है?"

तभी से मुझे एक ओर दिशा मिली और मैं सार्वजनिक स्थानों पर लिखें ऐसे नंबर को मिटाने में लग गया हूं, ताकि किसी ना किसी को तो बचाया जा सके। माना कि, हम किसी बुराई की वजह नहीं है, पर किसी अच्छाई की वजह तो बन ही सकते है।

मेरा आप सभी से निवेदन है कि, अगर आप कही भी इस तरह के नंबर और नाम देखें, तो तुरंत मिटा दो। ताकि एक अनजान खतरों से किसी की बहन-बेटियों की मदद हो सके। एक अकेले के साथ अगर लाखों का साथ मिल जाएगा, तो स्थिती जल्द ही बदलने लगेगी।🙏

(Sanjiv Kumar नामक फेसबुक अकाउंट से ली गयी पोस्ट।)...
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