Saturday, 7 December 2024

दान के प्रारूप...

हर उस आडम्बरी भामाशाह को; जो दान-पुण्य के नाम पर फोटो लेकर और मंचासीन होकर मान-सम्मान लेकर अपने आपको बड़ा भामाशाह समझ रहा है। उसे एक बार श्री मद्भगवद्गीता जी के अध्याय 17 के श्लोक 20-21-22 पढ़ने ही चाहिए। इसमें दान के रूपों का वर्णन किया गया है...

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेSनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्।।20।।
जो दान कर्तव्य समझकर, किसी प्रत्युपकार की आशा के बिना, समुचित काल तथा स्थान में और योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्त्विक माना जाता है।
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यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।21।।
किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छा पूर्वक किया जाता है, वह रजो गुणी (राजस) कहलाता है।
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अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्र्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।22।।
जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह तामसी कहलाता है।
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अब आप खुद से ही विचार करें कि, हम जो दान के नाम पर ढकोसला बाजी कर रहे है। क्या वह तामसी दान की श्रेणी में भी आता है या उससे भी नीचे...?

हम जो पुण्य के नाम पर या उसकी आड़ लेकर पाप कर रहे है, उसका परिणाम बहुत बुरा है। यह धर्म नहीं, अधर्म है और अधर्म का परिणाम तो आपको पता ही है...!🙏

जय श्री कृष्ण...🙏🚩

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