Friday, 21 March 2025

स्त्री: पुरुष की सोच में...!

जब भी महिला स्वतंत्रता या सशक्तिकरण पर बात होती है, तो एक विशेष पुरुष वर्ग महिलाओ के छोटे कपड़ो से लेकर उनकी मर्यादा तक, सभी ज्ञान एक साथ उडेलने लग जाता है। जैसे वे सब बाल ब्रम्हचारी, ऋषि-मुनी हो।

अरे मूर्खों...! अपनी नपुसंकतावादी सोच को थोड़ा तो कभी विराम भी दे दिया करो।

चलो, मान लिया कि, आज की आधुनिक महिला हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, पर अपनी मर्यादा भूल चुकी है। वह आधे कपड़े पहनती है। रात को देर तक घर की चार-दीवारी से बाहर रहती है। वह सबसे हंसकर बात कर रही है। तो क्या बलात्कार के पीछे बस यही वजह सर्वमान्य है? क्या एक स्त्री अपनी इज्जत लुटवाने स्वयं तुम्हारे पास आती है? क्या तुम अपनी मर्यादा में हो? क्या पर-स्त्री पर भूखे भैड़ियों की तरह टूट पड़ना तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में आता है?

तुम्हें पसंद यह नहीं आ रहा कि, एक स्त्री को पुरुष की पैर की जूती बनने से ज्यादा गँवारा चांद पर कदम रखना लग रहा है। उसे घर की चार-दिवारी से अच्छा दुनिया में स्वतंत्र घूमना लग रहा है और सबसे बड़ी बात... तुम इनका विरोध नहीं कर पा रहे, तो इनकी आधुनिक सोच का विरोध कर रहे हो। तुम इनकी बराबरी नहीं कर पा रहे, तो इन पर अपनी कुदृष्टि डाल डराने की असंभव कोशिश कर रहे हो।

अरे नपुसंकों...! मर्दानगी एक स्त्री की रक्षा करने में है, न कि उसकी इज्जत लूटने में। स्त्री हमेशा से पवित्र और पूजनीय थी, है और जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक रहेगी।

मेरी नजर में...
मर्द या पुरुष वही है, जिसको देखकर एक स्त्री अंधेरी रात में भी अपने आपको सबसे सुरक्षित और खुश महसूस करें। बाकी तो नामर्दों की भोज हर जगह भरी पड़ी है।

एक स्त्री की ऊँची उड़ान में उसके पंख न बन सको, तो चलेगा। लेकिन मांझा (पतंग का धागा) बन उसका गला मत काटों। यही पुरुष का स्वाभाविक गुण है, पौरुषत्व है।

(आप मेरे विचारों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन हकीकत से मुँह फेर लेना भविष्य के लिए कभी सही नहीं होगा।)

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